Shiksharth

Working for Education of Tribal Children

The blog is written by Vikas Shukla , Co- founder and Lead R&D

अभी कुछ दिनों पहले हमारी संस्था को एक बड़े कॉर्पोरेट घराने के सामाजिक जिम्मेदारी पटल से फ़ोन आया था| उनको दंतेवाड़ा जिले के कुछ गाँवों में अपने इस माध्यम से कुछ काम करना था| काम क्या था, बस गाँव वालों को कुछ आधुनिक कचड़ा बाँटना था| जिसे हमारा पढ़ा लिखा वर्ग, सुख – सुविधा कहता है, या, विकास का सूचक मानता है| इस काम के लिए उन्हें कोई स्थानीय गैर – सरकारी संगठन चाहिए था| हमने मना कर दिया|

असल में ये गाँव उनके प्रस्तावित खनन क्षेत्र के दायरे में आते हैं| कुछ माह पहले उसका स्थानीय लोगों ने व्यापक स्तर पर विरोध किया था, अधिग्रहण प्रक्रिया थोड़ी धीमी हुई थी| विरोध तो अब भी हो रहा है, पर सुनता कौन है? यही सोचता हूँ अगर गाँधी जी इन लोगों की स्थिति में होते तो क्या करते? अगर गाँधी ऐसे किसी गाँव में रहते, जहाँ से आप बाहर भी नहीं निकल सकते, तो क्या करते? अगर उनका अपने गाँव के बाहर किसी प्रकार का सम्पर्क नहीं होता, तो क्या करते? अगर उनके पास किसी प्रकार का संचार माध्यम नहीं होता तो क्या करते? आखिर गाँधी किस तरह अपनी ही मिट्टी में पैदा हुए ऊन लोगों का विरोध कैसे करते, जो इसके महत्व को नकार चुके हैं| क्या करते तुम बापू?? यही सोचता रहता हूँ आजकल…… कैसे करते अपनों का विरोध? कैसे करते अपनों कि गलती पर विचार?? या कुछ और ही करते? क्यों कि मेरी समझ में आप एक extraordinary creative हैं.

इस बात पर इतना जोर देने का मेरा अपना कारण और डर है| हमे फ़ोन आने के बाद, इस क्षेत्र कि strategic hamleting स्पष्ट रूप से दिखने लगी है| अर्धसैनिक एवं पुलिस बल के कैंप लग रहें हैं, और मज़े कि बात ये है कि, सुरक्षा बल वही समान बाँट रहें हैं, जो हमें बांटने को कहा जा रहा था| एक डरावना मंजर भी बनाया जा रहा है, खेतों में आग लगायी जा रही है, लोगों को गाँव से निकलने नहीं दिया जा रहा है, खेतों में फसल खड़ी है, पर किसान बंद किये जा रहें हैं, घर और जेल में| मुझे डर लगता है, जैसे सलवा जुडुम अलग रूप में आ रहा है| वैसे, ये कभी बंद ही नहीं हुआ| हाय री! विडम्बना, किसान का बेटा, मजदूर का भाई अपने ही माँ – बाप को, अपने ही बहन – भाई को जेल में बंद कर रहा है, मार रहा है, अपने ही खेतों में आग लगा रहा है, अपनी ही जननी को बाँझ कर रहा है|

इस सबके के जवाब में है, मध्य वर्ग का एक और पागलपन, नक्सलवाद, जिसे अभिजात्य वर्ग अपनी वासनाओं से सींचता रहा है| पर ये सबकुछ सही है, क्यों कि विकास करना है| एक को विकास करना है, एक उस विकास से अपनी भूख मिटाएगा और एक जो उसके रास्ते में आ रहा है, उसे दोनों मिलकर समाप्त कर देंगे|

आखिर, इसे मैं पढ़े लिखे वर्ग का घमंड न समझूँ तो क्या समझूँ? आखिर क्यों हमारे best brains लोगों कि मासूमियत नहीं देख पाते| उनको क्या समस्या है, अगर लोग शांत हैं? क्यों ये पढ़ा लिखा तबका शांति को पिछड़ापन मानता है? क्यों मितव्ययी को पिछड़ा मानते हैं? आखिर क्यों ये हमारी अहिंसक मिट्टी को हिंसा के रंग में रंग रहें हैं? क्यों इन्होंने हमारी व्यक्ति और संसार कि सहज समझ को समाप्त कर दिया है? इसे कैसे कोई विकास मान सकता है? मुझे नहीं समझ आता कि क्या देखकर हमने इस व्यवस्था को अपनाया है?    

इसके बीच में मैं अपने आपको फंसा हुआ पाता हूँ| चलिए माना कि, किसी एक को मना कर दिया या ऐसे सबको मना कर, एक भ्रम पाल सकता हूँ| पर जो हमारे व्यक्तिगत सहायक हैं वो भी तो आखिर इन्हीं के नौकर हैं| हम भी तो इसी पिशाचनी व्यवस्था का उपभोग कर रहें हैं| हवाई जहाज कि सवारी करने के बाद मुझे इस सत्य को पूरी बेशर्मी के साथ स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है|

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