वर्क्षो से जहाँ इतनी छाँव रहती थी की मनुष्य दिन में भी जाने से कतराता था आज उस अंधियारे को विकास की रोशनी में तब्दील कर खुश होता है…

दिल्ली से रायपुर कि दुरी 1,217.8 km और रायपुर से सुकमा की दुरी 395.1 km की है| मुझे इतना सफ़र करना था यहाँ पहुँचने के लिए और यह समझने और देखने के लिए की हम सब कुछ खत्म कर रहे है|

प्रकृति की रचना है हमारी पृथ्वी की श्रेष्ठ कृति है मानव। मानव द्वारा किए जा रहे नए अनुसंधानों और आविष्कारों से उसकी बढ़ती सुख सुविधाओं की लालसा एवं स्वार्थ और तेजी से बढ़ता औद्योगीकरण और नगरीकरण प्राकृतिक संसाधनों का अति एवं असंतुलित दोहन आदि ने सारे पर्यावरणीय कारकों जल, वायु, मृदा, वन, प्राकृतिक संसाधनों, आदि को भारी क्षति पहुंचाई है।

विकास किसी भी देश एवं मानव की चाहत होती है परन्तु हम बात करे दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों की तो हमें वह कहानियाँ याद आती है| जो हमें बचपन से अब तक अपने बड़े बूढों से सुनने को मिलती है कि तुम जहाँ खड़े हो यहाँ कभी जंगल हुआ करता था और यहाँ से नदी बहाँ करती थी जंगली जानवर हुआ करते थे आदि ऐसे  शब्द हमें उनसे सुनने को मिलते है फिर वह इस विकासशील समाज और पर्यावरण की निंदा में लीन हो जाते है कि लेकिन अब सब ख़त्म हो गया है और शुद्ध हवा का कही नामुनिशान नही मिलता और इस विकास की अंधी दौड़ ने पर्यावरण को खत्म कर दिया है| यही सब सुनते-सुनते हम उन कहानियों की कल्पना करने लगते है कि उस समय कैसी रही होगी यह जगह क्या सही में यहाँ जानवर हुआ करते होंगे कैसे बहती होगी नदी यहाँ से आदि कल्पनाओ में खोये रहते है और थोड़ी देर पश्चात ही हम व्यस्त हो जाते है अपने कामो में या फिर खो जाते है शहर की चकाचौंध में और भूल जाते है उन भावनाओ और उन कहानियों को जो हमने सुनी थी|

यहाँ बात यह है की हमने जो देखा नही उसके बारे में इतना सोच नही पाते ना ही उन कहानियों के पीछे का दर्द महसूस कर पाते है जो हमारे बड़े बूढों ने खोया और जिसे अब देखने के लिए उनकी आँखे तरसती है| मैं बात करने जा रहा हूँ छत्तीसगढ़ की जो कि एक नया राज्य है जहां सभी क्षेत्रों में तेजी से विकास हो रहा है। छत्तीसगढ़ विशेष तौर पर जाना जाता है अपने जंगल, नदी, आदिवासी, झरनों आदि के कारण पर क्या छत्तीसगढ़ भविष्य में भी इन्ही कारणों से जाना जायेगा जिन कारणों से आज जाना जाता है…?

छत्तीसगढ़ में नदी के किनारे वाले गांवों में उद्योग लगने जा रहे हैं। इससे लोगों को उम्मीद है कि इन कारखानों में उन्हें रोजगार मिल जाएगा। व्यापारियों का व्यापार बढ़ जाएगा, मकान मालिकों को किराएदार मिल जाएंगे और इससे उनका विकास होगा। छत्तीसगढ़ सरकार उद्योगपतियों को कारखाने लगाने के लिए आमंत्रित कर रही है उन्हें भूमि दे रही है। अकेले रायगढ़ जिले के आसपास लगभग डेढ़ सौ आयरन और पावर प्लांट लग चुके हैं। छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा जिंदल स्पंज और स्टील प्लांट यहां लग चुका है और जल्द ही उनका पावर प्लांट केलो नदी में लगने वाला है। इन कारखानों में पानी की पूर्ति नदियों के ऊपर बांधों से हो रही है। बांध बनने से नदियों में पानी हीं नहीं है और है भी तो इन कारखानों से निकला रसायनयुक्त गंदा पानी है जिससे नदियां प्रदूषित हो रही हैं| इन कारखानों के लगने और वनों की लगातार कटाई से पर्यावरण को इतनी ज्यादा क्षति पहुँच रही है कि “चित्रकूट वॉटरफॉल” जिसमें पुरे वर्ष पानी रहता था| वह इस गर्मी के मौसम में सुख गया और यह अभी की सबसे बुरी खबर है यहाँ के लोगो के लिए परन्तु इसके पश्चात भी यहाँ की सरकार को और लोगो को अपना अंत नज़र नही आ रहा वह अभी भी वह उद्योगपतियों लगातार आमंत्रित कर रही है| यह इस समय चर्चा का मुख्य विषय बना हुआ है कि क्या इसी तरह यह हर वर्ष सुख जाया करेगा…?

Chitrakoot Waterfall – Image Courtesy Go2India.in

छत्तीसगढ़ जंगल से घिरा राज्य है, यहां के लगभग 40 प्रतिशत भाग में जंगल हैं। आदिकाल से यहां के निवासी इन वनों पर ही आश्रित रहे हैं| औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण राज्य में वनों का प्राकृतिक क्षेत्र सिकुड़ता जा रहा है। मानव का स्वार्थ और लालच आग में घी का काम कर रहा है। सरकार, ठेकेदार और इन क्षेत्रों के निवासियों के कारण जंगल कटते जा रहे हैं जिसके कारण जंगली जीव-जंतुओं के लिए भी खतरा पैदा हो गया है। आखिर जंगल क्यों जरूरी है? पेड़ हमें क्या देता है? क्यों उन्हें बचाना जरूरी है?

जंगल के कटने से जंगली जीव-जंतु मनुष्य के घरो की ओर आने लगे हैं| आज छत्तीसगढ़ में गांव का गांव बंदरों के उत्पात से परेशान है| जंगल के कटने से खाने की तलाश में ये बंदर झुंड के झुंड गांवों में आने लगे हैं जिसके कारण गांव का पर्यावरण ही बदलने लगा है| बंदरों के आतंक से घर, खलिहानों में लगाए अमरूद, मुनगा, जामुन, इमली, सीतापेड़, बेर, बेल आदि को लोग काटने को मजबूर हैं| गांव वालों के अनुसार इन पेड़ों और घर, कृषिभूमि में जरूरत की सब्जी और फल उगाने के कारण ये बंदर गांवों की ओर आकर्षित होते हैं। इनसे उनके कच्चे मकान (खपरैल) को भी भारी नुकसान हो रहा है| इस कारण गरीब गांववालों को आर्थिक हानि का भी भार सहन करना पड़ रहा है| अब गांव के लोग भी पक्के मकान बनाने लगे हैं। आज गांव का नजारा ही बदल गया है| गांव की गली, मौहल्ले, चौपाले कांक्रीट की हो गयी है। घर का आंगन, दीवार, छत कांक्रीट के बनने लगे हैं। गांवों का पर्यावरण प्रदूषित होने लगा है, फिर भी जंगलो को बेरहमी से काटा जा रहा है|

धरती हमारी मां है| इससे हमें कम से कम ही वस्तुए लेनी चाहिए और इसकी निरंतर देखभाल करते रहना चाहिए| महात्मा गांधी ने कहा था “धरती सभी मनुष्यों एवं प्राणियों की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम है, परंतु किसी की तृष्णा को शांत नहीं कर सकती” विकास और पर्यावरण में एक बात साफ है कि जितने उद्योग लगेंगे, उतने ही जल, जंगल और जमीन कम होंगे| छत्तीसगढ़ में अच्छी मात्रा में खनिज हैं, पर उनके उपयोग के लिए सरकार को कुछ नियम कानून बनाने पड़ेंगे और इसकी देख-भाल के लिए भी कार्य करना होगा क्योंकि सबसे अहम बात यह है कि छत्तीसगढ़ में विकास और पर्यावरण का सबसे बड़ा मुद्दा आदिवासियों से जुड़ा है |

The blog was originally published in India fellow blog. The blog is written by Md. Azhruddin who was a former India fellow working in Shiksharth Sukma.

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