आदिवासी भारत की स्वदेशी (Tribal Community) है और भारत जनसंख्या में से 8% आबादी आदिवासी है| मुख्य रूप से यह जनजाति दूरदराज के इलाको जैसे – जंगलो और ग्रामीण इलाको में रहते है प्रकृति के पास – यह प्रकृति को अपना पूर्वज मानते है तथा पूजते है| जनजातिय लोग देश के विभिन्न भागो में अलग-अलग परिस्थितियों में रहते है| इनकी भाषाएँ एवं संसकृति अलग-अलग है और इनकी सामाजिक आर्थिक परिस्थितियां भी एक जनजाति की दूसरी जनजाति से भिन्न है|

अगर आदिवासियों के पतन की प्रक्रिया की बात की जाए तो हमें थोडा-सा पीछे जाना होगा – “औपनिवेशिक शासन काल” के समय कि अगर हम बात करे तो हम पाते है कि उस समय सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले क्षेत्र आदिवासी क्षेत्र ही थे क्योकि जब “ईस्ट इंडिया कम्पनी” का भारत में आगमन हुआ तब हम उनके लिए आदिवासी ही थे उनके अनुसार हमे ज़िन्दगी जीने का ढंग नही था ना ही अपने पास मौजूद खनिजो और प्राक्रतिक संसाधनों  को उपयोग करने की समझ उन्होंने विकास का वह मॉडल हमें दिया जो उन्हें पसंद आया और हमने उस मॉडल को ख़ुशी से अपनाया भी, क्योंकि उस समय शायद हमे उसकी आवश्यकता थी|

उन्होंने हमारे ही प्राक्रतिक संसाधनों का उपयोग कर हमे उसका सदुपयोग सिखाया, उन्हें उस समय व्यापार के लिए रेल और सड़क मार्ग की आवश्यकता पड़ी जिसके लिए उन्होंने इन क्षेत्रो में जंगल काटने का सिलसिला आरंभ किया इतना ही नही इसके पश्चात् उनकी नज़र खनिज संपदा पर पड़ी उसके लिए भी जंगल काटे गये तथा आदिवासियों को जंगलो से विस्थापित कर दिया गया और ब्रिटिश सरकार द्वारा खनिजो का दोहन किया गया| ब्रिटिश सरकार द्वारा खनिजो का दोहन इसलिए हुआ, क्योकि हमने उन्हें करने दिया और शायद अगर हम उन्हें इतना नही करने देते तो आज हम यहाँ नही होते जहाँ है या फिर हो सकता है इस से भी अच्छी जगह होते खैर यह तो बहस का एक मुद्दा है| परन्तु आज़ादी के बाद भी यह सिलसिला चलता ही रहा| आज भी खनिजो के लिये जंगलो की कटाई की जा रही है| उन्हें आज भी उसी प्रकार विस्थापित किया जा रहा है| जिस प्रकार “औपनिवेशिक शासन काल” में किया जाता था तथा आदिवासियों को उनके जंगलो तक पहुँचने पर भी रोक लगाई जा रही है|

बात यहाँ यह उठ रही है अब की “औपनिवेशिक शासन काल” के समय हमे विकास की जरूरत थी हमने अपने प्राक्रतिक संसाधनों का अगर दोहन ब्रिटिश सरकार द्वारा कराया भी तो अपनी ख़ुशी से और हम जंगल से विस्थापित हुए भी तो अपनी ख़ुशी से परन्तु आज के समय के हालात अलग है| आज हम “औपनिवेशिक शासन काल” की ब्रिटिश सरकार का रूप लेकर इनसे जबरदस्ती साम, डांड, दंड, भेद के आधार पर इनकी ज़मीने ले रहे है| अब जब इन्हें यह बात समझ आ गयी है की इस से हमारा पतन निश्चित है| तो आज यह अपने जंगल और जमीन के लिए लड़ रहे है| परन्तु हमारी अंधी सरकार को यह नज़र नही आता सरकार को केवल विकास ही नज़र आता है| हम इनको इनके हाल पर छोड़ दें तो जो विकास का मॉडल हमारा है, शायद  उससे अच्छे किसी मॉडल का आविष्कार कर दें हमारे पास “औपनिवेशिक शासन काल” के समय समझने या सोचने का समय नही था और आजदी के पश्चात् भी इतना समय नही रहा परन्तु अब हम क्या कर रहे है| सब कुछ देखते हुए भी इनका पतन कर रहे है|

हालांकि आज़ादी के बाद ऐसे क्षेत्रो को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए भारतीय राज्य द्वारा विभिन्न नीतियों एवं कार्यक्रमों को अमल में लाया गया| आदिवासियों की स्थिति को सुधारने के लिए भारत सरकार द्वारा विशेष प्रावधान की व्यवस्था की गयी थी| नेहरु जी ने आदिवासियों के विकास के लिए पंचशील सिद्धांत दिये|

  • पहला – लोगों को अपनी प्रतिभा और खासियत के आधार पर विकास की राह पर आगे बढ़ना चाहिए| हमें उन पर कुछ भी थोपने से बचना चाहिए| उनकी पारंपरिक कलाओं और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए|
  • दूसरा – जमीन और जंगलों पर आदिवासियों के हकों की इज्जत करनी चाहिए|
  • तीसरा – प्रशासन और विकास का काम करने के लिए हमें उनके लोगों (आदिवासियों) को ही ट्रेनिंग देने और उनकी एक टीम तैयार करने की कोशिश करनी चाहिए| जाहिर है, इस काम के लिए शुरुआत में बाहर के कुछ तकनीकी जानकारों की जरूरत पड़ेगी लेकिन, हमें आदिवासी इलाकों में बहुत ज्यादा बाहरी लोगों को भेजने से बचना चाहिए| 
  • चौथा – हमें इन इलाकों में बहुत ज्यादा शासन-प्रशासन करने से या उन पर ढेर सारी योजनाओं का बोझ लादने से बचना चाहिए| हमें उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं से मुकाबला या होड़ करके काम नहीं करना चाहिए| इसके बरअक्स उनके साथ तालमेल के साथ काम करना चाहिए| 
  • पांचवां – आंकड़ों के जरिये या कितना पैसा खर्च हुआ है| हमें इस आधार पर विकास के नतीजे नहीं तय करने चाहिए| बल्कि इंसान की खासियत का कितना विकास हुआ, नतीजे इससे तय होने चाहिए|

इन सिद्धांतो के पश्चात् भी अभी हाल ही में 13 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस नवीन सिन्हा और जस्टिस इंद्रा बनर्जी की बेंच ने 16 राज्यों के करीब 11.8 लाख आदिवासियों के जमीन पर कब्ज़े के दावो को खारिज़ करते हुए| राज्य सरकारों को आदेश दिया था कि वह अपने कानूनों के मुताबिक जमीने खाली कराएं और आदिवासियों को वहाँ से बेदखल करे, फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने 13 फरवरी के आदेश पर रोक लगाई हुई है| लेकिन यह समस्या काफी गंभीर है| अगर आदिवासियों को उनकी जगह से बेदखल कर दिया गया| तो आदिवासियों का पतन निश्चित है| ऐसे में जंगलो की सुरक्षा और आदिवासी संस्कृति और भाषा खतरे में पड़ जायेगी|

अगर इसको संरक्षित करने के लिए सरकार द्वारा कदम ना उठाये गए| तो औद्योगिकीकरण या विकास की प्रक्रिया के चलते आदिवासी संस्कृति एवं भाषा जो इतिहास की एक धरोहर के रूप में आज भी मौजूद है इसका शिकार हो जाएगी| आदिवासी जादूघर की चीज़ नही है| भारत के नागरिक है| संविधान जो हम भारत के लोग से शुरू होता है| उसमें वह भी उतने ही हिस्सेदार है| मगर कौन बतायेगा कि इनके विकास के पंचशील सिद्धांत पचास साल से किस अंधेरी कोठरी की किस टोकरी में धुल खा रहे है … ?

अब किसी आदिवासी इलाके के विकास को नेहरु पंचशील सिद्धांत के पैमाने पर कसें तो अंदाजा लग सकता है कि आदिवासियों के साथ हमने कैसा सुलूक किया है| बहस हो सकती है कि नेहरु कि पार्टी ने क्या किया … ? मगर इससे ना तो बहस खत्म हो सकती है और ना ही लोगों को सवाल पूछने से रोका जा सकता है| जिनके अस्तित्व पर खतरा पैदा होगा| वह तो सवाल पूछेंगे ही और जवाब ना मिलने पर कुछ तो नकारात्मक प्रक्रिया करेंगे ही परन्तु यह सरकार का फ़र्ज़ है कि उन्हें किसी भी हालात में नकारात्मक प्रक्रिया करने से रोके और उनके अस्तित्व की हिफाज़त करे अभी के हालातों में सुधार के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने की बहुत आवश्यकता है …

The blog was originally published in India fellow blog. The blog is written by Md. Azhruddin who was a former India fellow working in Shiksharth Sukma.

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