The blog is written by Abhijeet Tayade who works with Shiksharth in the role of Project co-odinator in Re-opening of Schools in Konta.

रात भर कोंटा पोटा केबिन मे बिताया साथ मे बंडी भी था | दसवी कक्षा की परीक्षा पास आ रही थी, तो सूर्यनारायन सर(अधीक्षक) से इजाजत लेकर बच्चो के डर को 3 बच्चो की कहानी ( सत्य कथा ) के माध्यम से थोड़ा हल्का करू इस सोच के साथ मै बच्चो से मिलने चला गया | बच्चे मेरा इंतजार कर रहे थे | सब एक लाइन बनाकर बैठे थे और जैसे ही मै अंदर गया तो उन्होने उठकर मेरा अभिवादन किया | सबको बैठने को कहा और हमारे बीच बातचीत शुरू हो गयी | मैंने हर बार देखा की कहानी सुनने के बाद सभी बच्चो के जो परीक्षा के डर से सहमे से होते है उनके चेहरे खिल जाते है और एक गजब की मुस्कुराहट उनके चेहरे पे आ जाती है | उसी रात खाना खाने के बाद मै और बंडी बहोत देर तक बाते करते रहे | बंडी बहोत अंदरूनी गाव से है नाम कन्हईमरका पर वो गुरुजी लोगो के साथ रहकर शाला मे पढ़ा है | उसके साथ होने से मै डर नही महसूस करता क्यू की वो यहा का स्थानिक है और यहा की भाषा आती है और ये इसलिए की मुझे अंदर के गाव मे जाना होता है जहा किसी भी प्रकार का स्त्रोत(सड़क,बिजली,नेटवर्क आदि) नहीं है | कल का दिन कुछ खास होगा इसी सोच के साथ सो गया ( जंगल घूमना मेरा शौक है और वो भी बस्तर के जंगल तो क्या कहना ) |

      दूसरे दिन मै और बंडी तैयार होकर चल दिये | नाश्ता करके हम जागीर सर(CAC) के कॉल का इंतजार कर रहे थे | सर बीच मे एक जगह रुककर ताड़ी ( झाड का पानी ) पी रहे थे, मै और बंडी पहुचे और चल दिये अपनी मंजिल की तरफ, पर इस मंजिल का सफर हम सब के लिए नया था क्यू की जागीर सर भी आज तक इन गावों मे और इन सडको से नहीं गए थे तो मतलब परेशानी थी | सर ने हमे पहले नहीं बताया शायद उन्हे लगा की हम डर जाएंगे | विस्फोट की कहानिया सुनते सुनते हमारा सफर शुरू हुआ नए रास्ते और नए शालाओ को देखने का |

      पहला गाव नीलामडगू जहा से हमे गाव के किसी व्यक्ति को साथ लेना था क्यू की आगे का रास्ता पता नही था, यहा से एक व्यक्ति को साथ लिए और चल दिये गाव चिन्नातोंग जहा संतोष नामक शिक्षादूत पढ़ाता है | मुझे और बंडी को शाला मे छोड़कर जागीर सर अपने दोस्त को ढूंढने चले गए जो की शिक्षक ही थे | शाला मतलब छोटी सी झोपड़ी और बच्चो की संख्या 12 तो जगह भी कम थी | श्यामपट (blackboard) देखके मुझे अच्छा लगा क्यू की ये मेरे देखने मे पहली शाला थी जिस पर बच्चो ने अपने हाथो से चित्र निकाले थे, जो मुझे अब तक के अंदर के किसी भी शाला मे देखने नही मिला (वर्णमाला और गिनती के अलावा) | मै भी बच्चो के साथ बैठ गया और बाते करने लगा, पर मेरी बोली उन्हे समज मे नहीं आ रही थी क्यू की वो गोंडी भाषा समजते थे तो मैंने इशारो इशारो मे बाते करना शुरू किया और थोड़ा फायदेमंद साबित हुआ और साथ मे बंडी द्विभाषी (transletter) था ही तो उसकी भी मदत हुयी | मैंने बच्चो से खूब बाते की | थोड़ी देर बाद सर वापस आ गए, अपने दोस्त से मुलाक़ात करायी | फिर कुछ शाला सामग्री का वितरण करके हम निकलने लगे तो हमे रोका गया क्यू की उस गाव मे हम सभी नए थे और आज तक किसिने हमे वहा नहीं देखा था तो जाहीर सी बात है की हमारी पूछताछ की जाए और वैसे ही हुआ | गाव का एक व्यक्ति हमे नहीं जाने दे रहा था, शिक्षादूत उसे समजा रहा था पर वो मानने को तैयार नहीं था | एक एक करके उसने मुझे और सर को अकेले मे बुलाया और बात किया | वो जानना चाह रहा था की हम कौन है ? कहा से आए है ? कहा रहते है ? यहा आने का मकसद क्या है ? अब तक पूरे गाव के लोग जमा हो गए थे | थोड़ी देर बाद ना चाहते हुये भी सभी गाव वालों ने मिलकर उसे समझाया और हमे जाने दिया |

       इस बार हमारे साथ संतोष भी एक व्यक्ति को साथ लेकर चल रहा था और यहा ऐसे ही होता है | मैंने थोड़ा बाजुमे जाकर पेशाब किया तो मुझे कहा गया की रास्ते से बाहर मत निकलिए क्यू की कहा क्या हो सकता है पता नहीं ( माइन id’s लगे हो सकते है उनके कहने का मतलब था ) | तीसरा गाव गोमपाड जहा पदमा नामक शिक्षादूत पढाती है | उसकी शाला अच्छे से संधारण करके रखी थी | पढ़ाई चल रहा था, बच्चो से थोड़ा बात करके गतिविधि करायी गयी और सामग्री वितरण करके गाववालों को अलविदा करते हुये रास्ते मे एक आंगनवाड़ी को भेट देके हम आगे की और निकल पड़े |

         पगडंडी सड़क होने के कारण गाड़ी चलाना मुश्किल होता है, शरीर भी दर्द कर रहा था | अगर थोड़ासा भी आप पीछे छूट गए तो घने जंगलो के बीच डर लगने लगता है और हॉर्न भी नहीं बजा सकते इसलिए सर के पीछे पीछे गाड़ी भगाना था | थोड़ी देर बाद हम चिंतागुफा गाव मे पहुचे और आज का खाना यही करना था तो कोसा ( मध्यान भोजन बनाने वाला व्यक्ति ) को कहा गया की मुर्गा बनाओ और गाव मे मुर्गा पकड़ने आ गए | मै खड़ा देख रहा था और बंडी से बाते कर रहा था उस वक़्त एक छोटा लड़का हाथ मे एक बड़ा सा चाकू लेके हमारी तरफ आ रहा था शायद कुछ काटने के लिए जा रहा हो | फील्ड पे जब भी निकलता हु तो साथ मे चने रखता हु | भूक भी लगी थी तो मै, बंडी और सर चने खा रहे थे | मैंने उस बच्चे से बात करना चाहा, उसके साथ एक छोटासा कुत्ता भी था | उस बच्चे को चने दिये और हम बाते भी कर रहे थे | तब तक बहोत पकड़ा-पकड़ी के बाद मुर्गा भी पकड़ मे आ गया था | बच्चे के साथ फोटो निकाले और उसे दिखाये तो वो खुश हो गया और उसके चेहरे की हसी ने मुझे खुश कर दिया क्यू की आमतौर पर यहा के बच्चे ज्यादा हसते नहीं है | हम आगे की और बढ़ते हुये भंडारपदर गाव मे पहुचे, वहा थोडी चर्चा हुयी | इस समय गाव मे गादे पंडुम(उत्सव) का वक़्त था तो सर ने बच्चो को गाने और नाचने को कहा तो मै भी उनके साथ जुड़ गया तो जागीर सर भी साथ देने आ गए | जाते वक़्त बच्चो ने हमे बेर और तेंदू फल लाके दिये | सभिका शुक्रिया करते हुये हम वापस चल दिये बिचमे एक नदी के पास सभों के साथ फोटो निकाले | एक जगह मोर (peacock) देखने मिला | चिंतागुफा पहुच कर खाना खाये और देशी मुर्गा तो बहोत ही लाजवाब था |

        बादमे बच्चो को इमली पेड़ के नीचे इकट्ठा किए और गतिविधि कराया पर बच्चे मजा नही ले रहे थे शायद हमसे डरे हुये हो | पर मेरा ध्यान उस बच्चे पर नही था जिसे हम मिले थे, वो शाला मे भी नही पढ़ता था फिर भी सिर्फ हमारे पीछे पीछे दूर तक भागते हुये वो शाला मे आया था | बंडी ने मुझे याद दिलाया की सर ये वही लड़का है जिसे हम गाव मे मिले थे | उसे भी हमने हमारे साथ शामिल किया | उसके चेहरे की खुशी देखकर जान गया की वो भी बाकी बच्चो की तरह शाला आना चाहता है, पर शायद उसकी अपनी कुछ मजबूरी हो इसलिए वो शाला नही आता होगा | हमारे निकलने का वक़्त हो चला था तो बच्चो को सामग्री वितरण करके हम चल दिये |          जाते जाते उस नए छोटे से दोस्त से बस इतना ही कह पाया की “ तुम भी बाकी बच्चो की तरह शाला आते जाओ और मै जब भी वक़्त मिलेगा तुम लोगो से मिलने आता रहूँगा “ पता नहीं की वो मेरी बात समज पाया की नही पर उसके चेहरे की हसी मुझे रात मे सुकून की नींद देने वाली थी जिसके लिए मै आज भी तरसता हु

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